Monday, May 15, 2017

Justice Markandey Katju echoes the words of Baha'u'llah - "The earth is but one country, and mankind its citizens."

 
By Justice Markandey Katju, former Judge, Indian Supreme Court

When I was a Judge of Allahabad High Court ( 199b1-2004 ) a large number of writ petitions were filed before me from time to time by old Pakistani citizens who had come to India on a visa of one month or so and did not want to go back.

So deportation orders were issued by the Indian government to deport them to Pakistan, which they challenged before me.

In every such case I would pass a stay order staying their deportation ' till further orders'. Since there are about a million ( ten lac ) cases in the Allahabad High Court, a case which had been heard once would usually be listed again after several years.

So the result of my stay orders was that in effect by a judicial order I converted a one month visa into a 5 year one or so ( because the case would come up again after 5 years or so, and till then the stay order would continue ).

Why did I do this ?

I did it because, as I have said repeatedly ( see my articles ' The Truth about Pakistan', etc online and on my blog justicekatju.blogspot.in ), I do not recognize the Partition of 1947, which was a historical swindle by the British on the basis of the bogus two nation theory, to keep Hindus and Muslims fighting each other, and thereby keep India, of which Pakistan ( and Bangladesh ) is really a part, weak and backward.

I refuse to be a party to this historical fraud and swindle and I have never recognized, and will never recognize Partition of my country. India and Pakistan ( and Bangladesh ) are one country, and are bound to be one day reunited under a strong, secular, modern minded government, which will not tolerate religious bigotry or extremism of any kind, whether Hindu or Muslim, and crush it with an iron hand.

So I regarded these petitioners before me as Indians. When they had been young men at the time of Partition they had been carried away by religious passions, incited by our British rulers or their agents, and in that fit of passion they migrated to Pakistan.

But now they had become old people, and were nostalgic and wanted to return to their native homes where they had spent their young days, and where many of their relatives still lived. Unfortunately, on migrating to Pakistan they lost their Indian nationality, and became Pakistanis.

The Indian Government has always been very reluctant to grant visas to Pakistanis, and even where it is granted after great difficulty, it is usually only for a short period of one month or so. Several conditions are also put on it, e.g. that the visa is only granted for living within one city, and there also one has to report to the nearest police station every week or so.

These old men ( and women ) had come on this short visa, and were reunited with their relatives and old friends, and wanted to spend the last days of their lives here. They realized the folly of their youth, but it was too late now, what could they do ?

As I said above, I do not recognize Pakistan. It is part of India, only temporarily separated, and I regard 'Pakistanis' as Indians ( whatever 'Pakistanis' may think of themselves ). So I regarded these petitioners as Indians. And how can an Indian be deported from India ?

I did not say so in my orders, but that was the real reason for passing them. 
 

Thursday, February 9, 2017

मानव एकता धर्म है जिनका - नवभारत टाईम्स, मुंबई (6 फरवरी 2017)

युगावतार बहाउल्लाह की 200वीं जयंती मुंबई के छोटे से बहाई समाज के लिए एकता बंधन और मजबूत करने का अवसर बनकर आई है। सम्पूर्ण मानव जाति की एकता के हिमायती इस समुदाय पर विमल मिश्र का कम्युनिटी कनेक्ट। 

•बहाई एकेश्वरवादी धर्म है जिसका मानना है कि सृष्टि के निर्माण में एक ही ईश्वर का योगदान है, सभी मुख्य धर्म एक ही ईश्वर से उत्पन्न हैं और सभी मनुष्य एक समान हैं। भगवान बहाउल्लाह के सन्देश की मुख्य अवधारणा यह है कि सम्पूर्ण मानव एक जाति है। उद्देश्य है सम्पूर्ण मानव जाति की एकता की प्रक्रिया में योगदान देकर सदैव प्रगति करने वाली सभ्यता को आगे बढ़ाना और वैश्विक समाज में बदल जाना।
•बहाई धर्म में धर्म गुरु, पुजारी, मौलवी या पादरी वर्ग नहीं होता है। वे जाति, धर्म, भाषा, रंग, वर्ग, आदि किसी भी पूर्वाग्रह को नहीं मानते। बहाई मंदिर सभी धर्मों और संप्रदायों के लोगों के लिए खुले होते हैं, जिनमें उन्हें प्रार्थना करने और धार्मिक मंत्रों का उच्चारण की अनुमति तो प्राप्त होती है, पर उपदेश देने या धार्मिक कर्मकांड की नहीं। दिल्ली का लोटस टेंपल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना और भारत में बहाई समुदाय का प्रमुखतम धर्म-स्थल है।
•विश्व शान्ति एवं विश्व एकता के साथ सभी के लिए न्याय, स्त्री–पुरुष की समानता, अनिवार्य शिक्षा, विज्ञान व धर्म का सामंजस्य और गरीबी व धन की अति का समाधान बहाई धर्म के मुख्य ‌सिद्धांतों में से हैं। भगवान बहाउल्लाह द्वारा 1873 के आस-पास लिखी गई लिखी गई पुस्तक "किताब-ए-अकदस" में इनका विवरण मिलता है।
•बहाइयों की जीवन शैली में सेवा अनिवार्य घटक है। बहाई ट्रेनिंग ‌इंस्टिट्यूट के पाठ्यक्रम व्यक्तिगत आध्यात्मिक सशक्तिकरण के अनुकूल होते हैं। स्वाध्याय से अर्जित ज्ञान को व्यक्तिगत व सामूहिक रूपांतरण में लगाने पर बल दिया जाता है।
•बहाई बच्चों को समाज का सर्वाधिक मूल्यवान संसाधन मानते हैं। वर्तमान में बच्चों के लिए 1000 से अधिक बहाई नैतिक व आध्यात्मिक कक्षाओं का आयोजन देश के विभिन्न हिस्सों में किया जा रहा है जिनका उद्देश्य है बच्चों में सत्यवादिता, विश्वसनीयता, ईमानदारी और न्याय को विकसित करके एक मजबूत नैतिक ढांचा तैयार करना ताकि भौतिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से श्रेष्ठता हासिल की जा सके। किशोरों में बढ़ती ऊर्जा प्रवाह को सही दिशा देने के लिए भी ग्रुप्स बनाए गए हैं। विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों को एक समान मंच पर बढ़ने का और इन शिक्षाओं को अपने व्यकिगत और सामाजिक स्तरों पर लागू करने का मौका देने के लिए स्टडी सर्किल हैं। युवाओं, वयस्कों और महिलाओं के ल‌िए भी कार्यक्रम हैं।
 
मुंबई में बहाई

बहाई धर्म की स्थापना महात्मा बहाउल्लाह (1817-1892) ने ईरान में की थी। वक्त के साथ सिद्धांतों को लेकर बहाई धर्म का इस्लाम के साथ टकराव बढ़ता गया और बहाई धर्मानुयायियों को उत्पीड़न से बचने के लिए ईरान से निकलना पड़ा। बहाई धर्मानुयायी बहाउल्लाह को भगवान और कृष्ण, ईसा, मोहम्मद, बुद्ध, जरथुस्त्र, मूसा, आद‌ि अवतारों की कड़ी मानते हैं। जिन 18 पवित्रात्माओं ने महात्मा बॉब (पैगंबर बहाउल्लाह के अग्रदूत) को पहचाना और स्वीकार किया था उनमें एक भारतीय भी थे।

भारत में पहले बहाई का आगमन 1844 में माना जाता है। बताते हैं, दुनिया भर के 180 देशों में फैले पचास लाख बहाइयों में से लगभग बीस लाख बहाई भारत में भारत के हर प्रदेश में 10000 से भी अधिक जगहों पर रहते हैं, जो ईरान से बाहर किसी देश में बहाइयों की सबसे बड़ी तादाद है। मुंबई में बहाई 1914 से रह रहे हैं और उनकी संख्या मात्र पांच सौ बताई जाती है। ये बहाई मुंबई के दक्षिण मुंबई व अंधेरी और ठाणे, कल्याण, पनवेल, नवी मुंबई और मालेगांव जैसी जगहों पर रहते हैं। ये लोग सभी तरह के धंधों और पेशों में और प्रतिष्ठित पदों पर हैं।

‘यूनिटी फीस्ट’ की एकता उनकी मुखमुद्रा पर लिखी है। सामू‌हिक प्रार्थना, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सहभोज। कोर्ट चैंबर्स, न्यू मरीन लाइंस स्थित लोकल स्प्रिच्चुअल असेंबली में हर उपलब्ध अवसर पर जुटने वाले चेहरे। इनमें तकरीबन हर एक-दूसरे से अच्छी तरह परिचित है। दरअसल, यह मेल-जोल उनकी जरूरत भी है और ताकत भी।

बहाई समुदाय में आपसी मेल-जोल के लिए नियम तय हैं। मसलन, नौ से ज्यादा बहाई कहीं हैं तो लोकल स्प्रिचुअल असेंबली में मिलेंगे जरूर। ‘बहाई मत में सृष्टा से सीधे संवाद के लिए सामूहिक प्रार्थना का सबसे अधिक महत्व है। आशय यह है कि जब विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग एक साथ बैठकर प्रार्थना करेंगे तो यह प्रेम और एकता का बंधन बनेगी’, लोकल असेंबली की सेक्रेटरी नरगिस गौड़ बताती हैं। ये आध्यात्मिक बैठकें सामुदायिक केंद्रों, या घरों में भी हो सकती हैं। उत्सवों के लिए भी इस धर्म में अवसरों की कमी नहीं। युगावतार बहाउल्लाह और संत बॉब की जयंती, पैगंबरी का वर्ष, वर्ष के नौ और 12 पवित्र दिन और 19 दिन का भोज। बहाइयों का कैलेंडर 19 महीने का होता है जिसमें हर महीने में 19 दिन होते हैं। कैलेंडर की शुरुआत 21 मार्च से होती है। 21 अप्रैल उनके प्रशासकीय वर्ष का शुरुआती दिन है। अपने प्रतिनिधियों का चुनाव वे गोपनीय मतदान के माध्यम से करते हैं। नैशनल बहाई स्प्रिचुअल असेंबली भारत के बहाइयों की सर्वोच्च संस्था है 17 प्रादेशिक तथा लगभग 600 लोकल स्प्रिच्चुअल असेंबलियां जिसके मार्गदर्शन काम करती हैं। 22 अक्टूबर को बहाउल्लाह की 200वीं जयंती मनाई जाने वाली है।

Wednesday, November 30, 2016

NSA requires Rs.5 Crores for a noble task, lets help them

National Spiritual Assembly of the Baha'is of India

November 28, 2016

To
All Regional/State Baha’i Councils
All Local Spiritual Assemblies

Dearly loved friends,

New Delhi, while being the capital City of India, also does the Indian Baha’i community proud by being the only Cluster to have more than one thousand core activities. The systematic teaching work being carried out at the House of Worship has greatly helped these community building endeavours and has opened new horizons for the progress of the Cause of God in India.

In its letter dated 28th January 2013 to the National Spiritual Assembly of India, the Universal House of Justice noted that the premises of the Baha’i House of Worship in New Delhi are being used for holding various educational activities, most notably Institute campaigns and that reports of these activities have brought great delight to the House of Justice. In light of this, the National Assembly was advised that..."In view of the potential for a significant rise in such activities in the period ahead, the House of Justice feels that it would be advantageous for there to be a facility that is associated with the Temple and dedicated to hosting educational programmes."

To this end, the National Spiritual Assembly has approved the construction of a multi-purpose facility on the premises of the House of Worship. The Temple Committee has finalised a conceptual drawing and is making efforts to obtain necessary permissions for construction. The Architects have been guided to give due consideration to both the beauty and functionality of the final design and to ensure that it is in harmony with its surroundings.

When the National Assembly shared an update on the progress made so far, the gracious response of the Supreme Body was to state that... “It shares the joy and pride that each one of your members undoubtedly feels as your community raises a facility with immense possibilities, a development that is both an acknowledgment of the marvellous accomplishments thus far achieved and a light that beckons the community to new horizons”.

It is estimated that more than Rs.5 Crores will be required for completing this task. The Universal House of Justice has encouraged the National Assembly to turn to the community of the Greatest Name in this country with the assurance that the House of Justice has “no doubt that they will respond generously to an appeal for funds”. Believers are urged to generously contribute towards this facility and for this purpose, a Savings Bank account, bearing No.108910100040397 in the name of “N.S.A. of the Bahais of India A/C MPFB” has been opened with the A.P. Bhawan Branch of Andhra Bank (IFSC Code: ANDB0001089) at New Delhi.

The National Spiritual Assembly is confident that the followers of the Blessed Beauty will respond to this request spontaneously and sacrificially and partake in the bounty of bringing this vision to reality - thereby assuredly attracting the blessings and confirmations of Baha’u’llah.

With warm and loving Baha’i greetings,

Yours in His service,

P.K. Premarajan
Treasurer

Wednesday, June 1, 2016

भारत में प्रभुधर्म के बाहरी मामलों के विभाग द्वारा आयोजित गतिविधियाँ

विश्व भर में आज भारत के युवाओं की आबादी सबसे अधिक है। यह एक ऐसी सच्चाई है जो देश के भविष्य के लिये असीम सम्भावनाओं और सम्भावित चुनौतियों के द्वार खोलती है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में भारत में प्रभुधर्म के बाहरी मामलों से सम्बन्धित कार्यालय और भारतीय लोक प्रशासन के संयुक्त प्रयास से इस विषय पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया।

समाज की दशा और दिशा के निर्धारण में आज नेतृत्व करने वाले युवा और निर्णय लेने वाले लोगों की जरूरत है-इस विषय का विश्लेषण करते हुये सेमिनार में विशेष रूप से समुदाय-निर्माण के कार्यों में युवाओं की भूमिका पर विचार किया गया। युवाओं पर मीडिया का प्रभाव और मौसम के परिवर्तन से सम्बन्धित मुद्दों को सुलझाने में युवाओं के योगदान पर चर्चा लम्बी चली।

भारत सरकार के युवा मामले और खेल मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव किरन सोनी गुप्ता ने अपने उद्घाटन-सम्बोधन में कहा कि युवा ही हैं जो विचारों की एक नई लहर ला सकते हैं। नेहरु युवा केन्द्र संस्थान के महानिदेशक मेजर जनरल दिलावर सिंह ने कहा कि हम जब युवाओं के योगदान पर विचार कर रहे हैं तो हर प्रकार की स्थिति पर भी विचार करना चाहिये। दिल्ली की एक बहाई युवा पूजा तिवारी ने समुदाय-निर्माण के कार्यों में युवाओं की भूमिका पर बल दिया और कहा कि आज के युवा एक बेहतर दुनिया की बातें सोचते हैं और सामाजिक विकास में हाथ बंटाना चाहते हैं। दूरदर्शन समाचार के वरिष्ठ परामर्शी सम्पादक केजी. सुरेश ने युवाओं पर मीडिया के प्रभाव की चर्चा करते हुए कहा कि एक मीडियाकर्मी होने के नाते वह महसूस करते हैं कि इन मुद्दों पर गहराई से विचार क्यों नहीं किया जाता। आज ज़रूरत है कि मीडिया से सम्बन्धित मुद्दों पर पूरी तरह से विचार किया जाये।

मौसम-परिवर्तन के क्षेत्र में अनुसंधान और विश्लेषण की असीम संभावनाओं पर अपने-अपने विचार व्यक्त करते हुये तीन युवा प्रतिभागियों ने कहा कि मौसम के मिजाज में हो रहे बदलाव से उत्पन्न हो रही समस्याओं के समाधान पर गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिये। लखनऊ स्थित सिटी मांटेसरी स्कूल में युवा सशक्तिकरण और क्षमता-निर्माण प्रभाग की प्रधान फरीदा वाहिदी ने कहा कि इस दिशा में आगे बढ़ने के लिये सबसे पहले तो तकनीकी ज्ञान की सीख की ज़रूरत है उसके बाद क्षमता-निर्माण की, इच्छा-शक्ति और फिर संकल्प-शक्ति की आवश्यकता है।

• दिल्ली स्थित राष्ट्रीय बहाई कार्यालय में ऑफिस ऑफ पब्लिक अफेयर्स ऑफ द बहाईज़ ऑफ इंडिया द्वारा एक अन्तर्धर्म बैठक का आयोजन 9 फरवरी, 2016 को किया गया। इस बैठक का उद्देश्य विभिन्न धर्मों के लोगों को एक मंच प्रदान करना था, जहाँ धर्मों के प्रतिनिधि अर्थपूर्ण सम्वाद कर सकें और सामाजिक मुद्दों पर निरन्तर ऐसे सम्वादों को जारी रखा जा सके। साथ ही, एक ऐसी प्रक्रिया को भी शुरू किया जाना इस बैठक के उद्देश्य में शामिल था कि किस प्रकार सामाजिक प्रगति के विभिन्न पहलुओं तथा एक बेहतर समाज के निर्माण में धर्म की रचनात्मक भूमिका की खोज़ की जा सके जिससे लोगों के बीच परस्पर प्रेम और एकता समान मूल्यों पर स्थापित हो।

ऑफिस ऑफ पब्लिक अफेयर्स ऑफ द बहाईज़ ऑफ इंडिया के शत्रुहन जीवनानी ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि धर्म के नाम पर झगड़े-फसाद ने धर्म को बदनाम कर दिया है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि धर्म का बहुत बड़ा योगदान शांति और भाईचारे को स्थापित करने में रहा है और प्रगतिशील रूप से धर्म ने लोगों को आचारसंहिता दी और सभ्यता के विकास की प्रक्रिया में विभिन्न धर्मों ने बहुत बड़ी भूमिका निबाही है। बैठक के आरम्भ में तो संदेहास्पद स्वर का आभास हुआ, लेकिन जैसे-जैसे अर्थपूर्ण संवाद बढ़ता गया यह स्पष्ट होता चला गया कि इस मंच ने वह माहौल देने का वायदा किया है जो दूर-दूर रह रहे लोगों को परस्पर प्रेम और मित्रता के धागे में पिरो सकता है। सभी धर्मों के लोगों का मानना था कि विचारों की भिन्नता हो सकती है लेकिन गंतव्य तो सबका एक ही है - दुनिया में शांति और सद्भाव की स्थापना।